विष्णु लांबा : दरख्तों और परिंदों से जुड़ी है जिंदगी

जयपुर। श्री कल्पतरू संस्थान के संस्थापक विष्णु लांबा बचपन से ही पर्यावरण की रक्षा और पौधरोपण अभियान से जुड़े हैं। वे अब तक लाखों पौधे लगा चुके हैं। आज शहर में कहीं भी कोई पेड़ काटा जाता है तो स्थानीय निवासी और संबंधित व्यक्तियों को विष्णु लांबा विश्वसनीय और सहयोगी नाम लगता है, जिन्हें वे तुरंत सूचना देते हैं।

ऐसे जगा समर्पण
लांबा बताते हैं, मेरा जन्म टोंक जिले के गांव लांबा में हुआ। जब होश संभाला या कहिए कि कुछ सोचना समझना शुरू किया तबसे पेड़ लगा रहा हूं। हमारे खेल-खिलौने पेड़ ही हुआ करते थे। पेड़ों पर चढऩा, पक्षियों के बच्चे ले आना, उनके साथ खेलना। हमारे गांव में एक ही हैंडपंप हुआ करता था। मैं अपनी मम्मी के साथ पानी भरने गया। वहां गोबर के ढेर में आम का पौधा उग रहा था, मैं उसकी तरफ जिस तरह देख रहा था, मुझे देखकर मां ने पूछा, लेकर चलना है? मैंने कहा हां। मां ने उसे अपने पल्लू में बांध लिया और घर लाकर लगा दिया। मां ने उस पौधे को घर के बाड़े में लगा दिया और रोज उसे पानी देतीं। बस यहीं से पौधों के प्रति लगाव बढ़ा।

उखाड़ लाते थे दूसरों के पौधे
मुझे देखकर मेरे दोस्त भी पौधे लगाने लगे। फिर तो हमारा पूरा ग्रुप बन गया। हमारे ग्रुप ने कुछ समय के लिए पूरे गांव में आतंक मचा दिया। जो लोग भी पौधे लगाते, हम उनके पौधे उखाड़ लाते और अपने-अपने बाड़े में लगा देते। इससे घर पर शिकायतें आनी शुरू हो गई। हम फिर भी नहीं माने। इस पर गांव वालों की ओर से जो भी अपने यहां पौधे लगाता, दो पौधे हमारे ग्रुप को देता और कहता अब हमारे पौधे चोरी नहीं होने चाहिए। इनका ध्यान रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है। इससे हम उनके पौधों को हाथ भी नहीं लगाते।

ऐसे हुआ जयपुर आना
गांव में रहकर फिर पौधे चुराने लगा, तो घर वालों ने बुआ के यहां पढऩे भेज दिया। वहां भी बुआ के पास शिकायतें आने लगीं तो ताऊजी के पास जयपुर भेज दिया। यहां भी मैं पूर्व कलेक्टर श्रीमत पांडे की नर्सरी से पेड़ चुरा लाया। लाकर घर पर लगाए तो ताऊजी को शक हुआ। उन्होंने मुझे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन ताईजी से बोले शाम तक पता लगा लो कि कहां से लाया है, वरना आज इसकी खैर नहीं! जब मैंने बताया तो ताऊजी पीटकर श्रीमत जी के घर ले गए। उन्होंने कहा चोरी करना गलत है, लेकिन पौधे लगाना तो अच्छी बात है। उन्होंने गिफ्ट में पौधे दिए तो ताऊजी ने मना कर दिया और कहा मैं इसे खरीदवाकर लाऊंगा। तब मुझे कई पौधे ताऊजी ने खरीदकर दिए।

और कल्पतरू की नींव रखी गई
लेकिन मेरी शिकायतें ताऊ जी के यहां भी शुरू हो गई, ताऊजी ने वापस गांव भेजने का मन बना लिया। इस पूरे समय के दौरान बड़े भाई के द्वारा मेरा आरएसएस से जुडऩा हो गया था। जब आरएसएस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को पता चला कि मैं वापस गांव जा रहा हूं, तो उन्होंने अपनी पहचान न उजागर करने का वादा लेते हुए मेरे रहने की व्यवस्था की और हर महीने 3000 रुपए खर्च देना शुरू किया। जब आरएसएस के सीनियर्स को पौधरोपण के प्रति मेरे लगाव के बारे में पता चला तो उन्होंने एनजीओ बनाने को कहा। मां सोमवार का व्रत करती हैं, उन्होंने मंदिर से कल्पवृक्ष का पत्ता लाकर दिया तो यहीं से मन विचार आया कि क्यों न एनजीओ का नाम यही रखा जाए। इस तरह श्री कल्पतरू संस्थान का मई 2011 में रजिस्ट्रेशन हुआ।

ऐसे बना कारवां
गांव में जो भी पेड़ लगाता, लोग उसे तोड़ देते, लेकिन पुलिस ऑफिसर से लगवाए गए पौधे को किसी ने नहीं छुआ। इस पर दिमाग में ये बात आई कि क्यों न पुलिसवालों को अपने इस अभियान से जोड़ा जाए। अब तक तकरीबन सैकड़ों आईपीएस और राजनेताओं से पौधे लगवा चुका हूं। साथ ही कई बॉलीवुड कलाकार भी हमारी मुहिम से जुड़े हैं। अपने इस काम के लिए हम किसी से कोई फंड नहीं लेते। राखी सावंत से जब हमने परिंडे लगाने की गुजारिश की तो उनके मैनेजर ने कहा इसके लिए 6 लाख देने होंगे। तब कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें मेरी मुहिम के बारे में बताया तो तो राखी ने न केवल परिंडा लगाया बल्कि 21 हजार रुपए का फंड भी कल्पतरू को दिया। ओटीएस परिसर में 500 कारों की पार्किंग के लिए 5000 विशाल बड़े पेड़ कटने वाले थे। तो हमने सालभर आंदोलन किया। हस्ताक्षर अभियान चलाया, कोर्ट में केस किया और सफलता मिली। पर्यावरण के साथ किसी सरकार ने न्याय नहीं किया। पेड़ के चारों तरफ डामर लगा दी जाती है ताकि वह सूख जाए और उसे काट दें। विकास के नाम पर यह प्रकृति से खिलवाड़ है।

भाई की शादी में बारातियों को दिए पौधे
मैंने शादी करने से मना कर दिया तो छोटे भाई की शादी की बात हुई। ऋग्वेद काल के बाद पहली बार पर्यावरणीय विवाह मेरे भाई का हुआ है। मेरे पास पिताजी का फोन आया तो कहने लगे कि कन्या के पिता मांग के बारे में पूछ रहे हैं। तो मैंने कहा कि कह दीजिए दो पौधे देकर कन्या को विदा कर दें। इस पर उन्होंने बेटी को तो पौधे देकर विदा किया ही, बारातियों को भी विदाई में ट्रैक्टर भरकर पौधे दिए। शादी में हमने व्यवस्था रखी कि मेहमान पहले पौधा लगाएंगे फिर भोजन करेंगे। कागज की पत्तल की जगह बरगद के पेड़ के पत्तों की पत्तल बनवाई और कुम्हार से शकोरो में पानी की व्यवस्था कराई। गांव के किनारे 101 गड्ढे कराए मेहमान पहले पेड़ लगाते और फिर भोजन करते।

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