‘सरकार’ नहीं, सरकारों की लापरवाही?

– संजीव माथुर –
केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर कोरोना वायरस संक्रमण रोकने में लापरवाही का ठीकरा फोड़ा है। केंद्र सरकार की ओर से मुख्य सचिवों को भेजे पत्र में कहा गया है कि 18 जनवरी से 23 मार्च तक विदेश से 15 लाख से ज्यादा लोग भारत आए। राज्यों को सूचना देकर लगातार इनकी निगरानी करने को कहा गया था, लेकिन लापरवाही बरती गई। सवाल यह है कि लगातार निगरानी का क्या मतलब था? क्या इसका मतलब 14 दिन के क्वारेंटाइन का पालन करवाना था? यदि ऐसा था तो भारत के शुरुआती तथा राजस्थान के पहले कोरोना पॉजिटिव केस को क्या कहें? इटली का यह कोरोना पॉजिटिव दंपती 21 फरवरी को भारत आए इटली के 23 सदस्यों वाले टूरिस्ट दल में शामिल था। दिल्ली एयरपोर्ट पर इनकी स्क्रीनिंग हुई होगी, लेकिन जैसा कि केंद्र का कहना है कि राज्यों ने निगरानी में लापरवाही बरती तो सवाल उठता है कि क्या यह टूरिस्ट का दल भारत में 14 दिन के क्वारेंटाइन के लिए आया था? टूरिस्ट दल घूमने आया था जो दिल्ली एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग के बाद राजस्थान आकर 8 दिनों में 6 जिलों में घूम लिया। 28 फरवरी को उदयपुर से जयपुर पहुंचने के बाद तबीयत खराब होने पर दंपती को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव मिला।
सच तो यह है कि मार्च की शुरुआत तक तो ‘क्वारेंटाइन’ शब्द ही सुनने को नहीं मिल रहा था, हम केवल थर्मल स्क्रीनिंग करके निश्चिंत हो रहे थे कि कोई कोरोना संक्रमित भारत में प्रवेश नहीं कर रहा है। यदि केंद्र सरकार को यह पता था कि बाहर से आए व्यक्ति की स्क्रीनिंग में कोई कोरोना लक्षण ना होने पर भी 14 दिन में यह सामने आ सकते हैं तो विदेशी पर्यटकों आने की अनुमति कैसे मिल रही थी? वे तो घूमने ही आ रहे थे, क्वारेंटाइन के लिए नहीं। उनकी राज्य सरकारें क्यों और कैसे निगरानी करतीं? अपनी उपलब्धियों के फुल पेज विज्ञापन देने वाली सरकार यदि विज्ञापनों से ही जनता को कुछ जागरूक कर देती तो फायदा ही होता। जनवरी की तो छोड़ए, मार्च की शुरुआत में भी जब भारत में कोरोना के मामले धीरे-धीरे आने लगे, तब भी केंद्र सरकार की ओर से जनता में जागरूकता की कमी रही। 17 मार्च के बाद जागरूकता के विज्ञापन दिखने लगे। आज जो सड़कों पर पलायन दिख रहा है, यह उस जागरूकता की ही कमी है, जो समय रहते और सरल भाषा में उन तक नहीं पहुंची। नोवल कोरोना वायरस, कोविड 19, सोशल डिस्टेंसिंग, कम्युनिटी ट्रांसमिशन, सेल्फ क्वारेंटाइन, लॉकडाउन…. ये आपको समझ में आ सकते हैं, बेचारे गरीब मजदूर को तो आज तक समझ नहीं आ रहा। वो तो इतना समझ सकता है कि विपदा आ पड़ी है, अपने गांव, अपने घर पहुंचा जाए। लॉकडाउन के निर्णय पर कोई सवाल नहीं, लेकिन पूरी तैयारी के साथ ये क्यों नहीं हुआ? अंदेशा बहुत पहले से था, लेकिन तैयारी नहीं थी। वरना जनता को सरकारों पर भरोसा रहता और वो दिखता भी।

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